मस्त बनाम भदोही

भदोही। भाजपा का भदोही में अलग सियासी इतिहास रहा है। पार्टी ने जब जब सांसद वीरेन्द्र सिंह मस्त का भदोही से टिकट काटा है बीजेपी के हिस्से में हार ही नसीब हुई है। यह हम नहीं कह रहे हैं। यह सौ फीसदी सत्य भदोही संसदीय इतिहास के पन्ने में दर्ज है।

वर्ष 1991 में पहली बार भदोही से भाजपा सांसद चुने गए वीरेन्द्र सिंह मस्त का सफर 1996 तक जारी रहा। वह 1996 में फूलन देवी से हारे तो 1998 में उन्हे फिर जीत मिली। लेकिन अगले ही वर्ष 1999 में फूलन देवी से फिर हार मिली। फूलन देवी की हत्या के बाद वर्ष 2002 में हुए उप चुनाव भाजपा ने पहली बार वीरेन्द्र सिंह का टिकट काटा और पिछड़ी जाति के कद्दावर नेता रहे पूर्व विधायक रामचंद्र मौर्य को उतारा, लेकिन भाजपा का यह पिछड़ा कार्ड फेल हो गया। रामचंद्र जमानत जब्त कराने के साथ चुनाव हार गए। इसके बाद वर्ष 2004 में यह सीट बसपा के नरेन्द्र कुशवाहा जीतने में सफल रहे। हालांकि स्ट्रींग आपरेशन में फंसे कुशवाहा का चुनाव निरस्त होने के बाद हुए उपचुनाव में बसपा के ही रमेश दूबे सांसद बने। भाजपा ने एक बार फिर वर्ष 2009 में इस सीट से वीरेंद्र सिंह मस्त को टिकट नहीं दिया और महेन्द्रनाथ पांडेय (वर्तमान समय में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष) को मैदान में उतारा, लेकिन वह भी बसपा के गोरखनाथ पांडेय से चुनाव हार गए। वर्ष 2014 के चुनाव में भाजपा ने फिर भदोही से वीरेन्द्र सिंह मस्त को उतारा और वह अब तक के सबसे अधिक रिकार्ड मतों से चुनाव जीत कर दिल्ली पहुंचे। एक बार फिर भाजपा भदोही के ही कुछ नेताओं नै वीरेन्द्र विरोंंधी मुहिम चलाकर बीजेपी को गलती दोहराने पर विवश कर दिया।

भाजपा ने वही पुरानी गलती दोहराते हुए वीरेन्द्र सिंह मस्त का भदोही से टिकट काट कर रमेश बिन्द के रूप में पिछड़ा कार्ड खेला है। इस वजह से जहां पहले क्षत्रिय नाराज वहीं, वही पार्टी के तमाम ब्राहमण चेहरे होने के बाद भी किसी को तरजीत नहीं मिलने से भी मायूसी का आलम है। विप्र समाज की ओर से नारा लगने लगा है कि रंगनाथ अपना भाई है, भले ही बसपाई है।

अब ऐसे में देखने वाली बात यह होगी कि रमेश का हश्र क्या होता है। क्या उनके भी अध्याय में इतिहास खुद को दोहराता है या फिर वह यहां जीत दर्ज कर वीरेन्द्र सिंह मस्त की कर्मभूमि वाली सियासत की विरासत पर कब्जा जमा लेंगे ? इस बात का फैसला 23 मई को परिणाम सामने आने के बाद होगा।

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