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Tuesday, February 25, 2020
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ज्ञान की बात: ब्रह्म को जाने, माने और पहचाने

ज्ञान की बात….

मिथिलेश द्विवेदी

ब्रह्म क्या है?

उत्पत्ति का कारण रूपी कारक ही ब्रह्म हैI

उत्पत्ति का कारण क्या है ?

संयुग्मन ही उत्पत्ति का कारण है, यह संयुग्मन आदिसमुद्र और अक्षर ब्रह्म के मध्य होता है।जिससे अखण्ड विश्व ब्रम्हाण्ड का निर्माण होता है।

आदिसमुद्र क्या है?

आदिसमुद्र तीन प्रमुख उर्जारूप शक्तियों और एक परम उर्जारूप चेतन शक्ति का सागर है।जिसमें चेतना शक्ति सतत प्रवाहमान है।
क्या चेतना शक्ति जीव नहीं है,क्यों इसे शक्ति से संबोधित करती हो? नही चेतना शक्ति जीव नहीं,चेतना शक्ति का नाश है,और निर्जीव शक्ति का भी।(यहाँ नाश से आदिसमुद्र में विलिनता से है,क्योंकि तत्व का नाश नहीं।)

जीव क्या है

जीव अक्षर ब्रह्मरूप परमसमुद्र रूप सागर की एक लहर है।जो उसी से उठती है, और उसी में समाहित हो जाती है।

क्या समुद्र दो हैं?

नहीं,अक्षर ब्रह्मरूप समुद्र को अक्षय वट वृक्ष रूप में भी देखा जाता है।यहाँ समुद्र का सम्बोधन वेदांत से ली थी।

क्या जीव (आत्मा) अलग है,परम् अक्षर रूप वृक्ष से?

नहीं,यह अलग मात्र इतना ही मान सकते हैं, की वृक्ष का पत्ता रूप ही जीव है।जो स्वयं को चेतना के कारण अज्ञानता वस स्वयं को वृक्ष से अलग स्वीकार करता है। क्या यह बात साँख्य योगी मानेंगें? नहीं, क्योंकि उनके दिमाग में आदिसमुद्र संकल्पना के ब्रह्मजगत (त्रिजगत) का अस्तित्व नहीं है। वे त्रिजगत को स्वप्न मानते हैं।

क्या कर्मयोगी, और भक्ति मार्गी उक्त कथन को स्वीकार करते हैं?

हाँ, कुछ हद तक क्योंकि पुराणों में जीव का संगठन न हो पाने के कारण उन्हें आदिसमुद्र में कर्मभोग माध्यम से लीन होने को स्वीकारा गया है। यानी एक ब्रह्मस्वरूप (विराट रूप) और दूसरा चेतन रूप जीव छोटा स्वरुप। जीव के छोटे स्वरूप की स्वीकृति आदिगुरु शंकराचार्य स्वामी के भाष्यों में मिलता है।जबकि अन्य भाष्यकारों द्वारा विराट रूप की स्वीकृति है।

आदिसमुद्र से जगत क्या है?

आदिसमुद्र में चेतन तत्व (आत्मा) द्वारा तीनों निर्जीव तत्त्वों का सक्रियण और संयोजन अत्यंत सूक्ष्म अवस्था में हो पाता है,जो पहले प्रकाश, बाद में ध्वनि, रूप में संघनित होता जाता है।जहाँ तक सघनता ध्वनि रूप में है, उसे ब्रम्हजगत, और आगे,जहाँ सघनता बढ़कर धुंआ सदृश हो जाती है, उसे तम जगत,और क्रमशः ऊपर जाने पर पदार्थ वायु,फिर जल,बाद में ठोस रूप में परिवर्तित हो जाता है।जिसे दृष्य जगत या भौतिक जगत भी कहते हैं। यह भौतिक जगत ही को रजलोक से संबोधित करते हैं।यही अवस्था को पदार्थ की तीन अवस्था,स्थूल, शुक्ष्म और अतिशूक्ष्म के नाम से भी जाना जाता है।

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